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असुविधा के लिए खेद है ।

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''कौन सी दुनिया में रहते हो तुम ? कितना कुछ झेला है हिंदुस्तान ने इन लोगों की वजह से...आज तुम जैसे कुछ लोग कुछ समझते ही नहीं ।''.......  '' राजपूतों और मराठों के इतिहास को मिटा रहे हैं तुम जैसे लोग ।''.....    ''क्या हो गया है सभी हिंदुओं को '' .......  ''पाकिस्तान शिफ्ट हो जाना चाहिए '' ...... आदि आदि । ईद मुबारक़ के स्टेटस लगाने से पहले ही मुझे पता था कि हर बार की तरह इस बार भी कई जगह से तीखी प्रतिक्रिया आएंगी।  अब जो भी हो मैं ऐसा ही हूं । और वास्तव में ही . . .मैं ना जाने कौन सी दुनिया में रहता हूं . . . जो मेरे आस- पास आने वाले और धीरे-धीरे मेरे खास बन जाने वाले अधिकांशतः लोग अपनी जाति- धर्म की उन 'सो कॉल्ड' छवियों से दूर,  बहुत दूर होते हैं जिन छवियों के कारण उन्हें प्रशंसित  या दमित किया जाता रहा है।   मैं ऐसे मुस्लिमों को जानता हूं जिन्होंने अपने कमरे में राधा कृष्ण की मूर्ति रखी हुई है,  जिन्होंने अपने आँगन में तुलसी का पौधा लगाया हुआ है । ऐसे ब्राह्मणों को जानता हूं जो उर्दू से लेकर नमाज़ पढ़ने तक के तौर ...

किताबों की बात

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#समीक्षित_विचार आज एक मित्र (Devanshu Singh ) ने प्रश्न किया कि मेरी किताबें मुझसे क्या कहती है....क्या बातें करती हैं ?.....अब इस प्रश्न का कोई सहज उत्तर नहीं है मेरे पास...सो माफ करना उत्तर किंचित दीर्घात्मक होने की सम्भावना है | मॉ_बताती_हैं कि मै ढाई बरस का था जब अक्षर मिलाकर पढ़ना सीख गया था....इस आधार पर यह माना जा सकता है कि किताबों से बतियाने का सिलसिला करीब 19 बरस से चल रहा है....अनगिनत किताबों से बातें हुई इन 19 बरसों में ,प्रमाणिक रूप से संख्या तो बताना संभव ही नहीं | हॉ अगर पिछले कुछ वर्षों की बात की जाये तो कह सकता हूँ कि पिछले छः वर्षों मे करीब 50 कविता संग्रहों और इतने ही उपन्यासों और कहानी संग्रहों के इतर विधाओं की करीब 200 किताबों से बाते हुईं | और करीब 150 पुस्तके अभी वरीयता की ऊपरी दो सीढ़ियों पर शेष भी है | दिनकर जी कहते थे कि "लेखक जीवन भर एक ही किताब लिखता है"......दूधनाथ जी मानते है कि " विभिन्न पात्रों के सभी विचार लेखक के ही होते है...वह उसके व्यक्तित्व का ही खण्ड - खण्ड रूप है "  यदि थोड़ी सी छूट मिले तो #मै_कहूंगा_कि  पाठक भी ए...