. . . . मज़दूर आ रहे हैं
मज़दूर आ रहे हैं । वे आ रहे हैं क्योंकि शासन प्रशासन उन तक नहीं जा पाया । वे आ रहे हैं क्योंकि वो शहर उनको रोकने की शक्ति नहीं जुटा पाए जिनको बसाने में उनके कंधों ने बोझ उठाया था , जिस को बसाए रखने में उनके जिस्म दोहरा गए थे । बच्चों को छोड़कर घर-घर काम करने वाली हज़ारों-हज़ार महिलाएं आज अपने बच्चों को लिए सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय कर रही है । जिन घरों में सुबह-शाम की जीवन शैली उन पर निर्भर हुआ करते थी, उनमें से कोई भी घर इनको रोक पाने में सक्षम नहीं हो पाया । मेरा एक दोस्त दिल्ली के आकर्षण से खिंच कर वहां गया था, कई साल वहां रहने के बाद घटनाक्रम कुछ यूं बना कि वापस उसे यही लौटना पड़ा । आज वह सामान्य बातचीत में भी कह देता है कि ''दिल्ली किसी की नहीं हो सकती''। असल में शहरीकरण ने आंखों में चकाचौंध तो खूब भरी पर गरीब का पेट भरने में वो काफ़ी सफल नहीं हो सका । संविधान से जीवन और आजीविका की गारंटी मिलने भर से जीवन और आजीविका का मिलना और उसका बना रहना सुनिश्चित नहीं होता । मोबाइल जर्नलिज्म के इस दौर में उन मज़दूरों की पीड़ा , उनके दर्द को बयां करते ना जाने कि...