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निखिल।

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#समीक्षित '' गिटार के तार बजते भले ही बाहर हों ... पर छेड़ा उन्हें अंदर जाता है .., दिल के अंदर ।''- माधव निखिल को कुछ समझाने की कोशिश कर रहा था । निखिल को घंटा कुछ समझ आ रहा था । आस-पास के दो-चार मुहल्लों में अगर कोई लड़का इन दिनों सच्चे इश्क में था , तो वह निखिल था । इश्क के शहर में अभी हाल ही में दाखिल हुए निखिल को  इश्क हर मर्ज की दवा लगता , हर मुश्किल का हल लगता । इन दिनों हर बात , हर मसले - मुश्किल को सुलझाने की कुब्बत रखने वाला निखिल ''मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती'' वाले पड़ाव पर जी रहा था ''घर वाले नहीं मानेंगे'' वाली सच्चाई से बिल्कुल बेखबर  । वो बड़े खूबसूरत सपने सजाता और उन्हे अपने दोस्तों के साथ में साझा करता । माधव को इश्क में नाकाम होते देख सोचता कि उसके और कामिनी के बीच आने वाली मुश्किलों को वह कितने अच्छे से हैंडल कर लेता है । वो माधव को भी एक सांस में कई सजेशन दे डालता है , माधव सुनता है उसे .... बड़ी खामोशी के साथ ।  आखिर बस मुस्कुरा देता है । करने को माधव आगाह कर सकता है निखिल को पर निखिल ने अभी-अभ...

रास्ते ।

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कार अपनी स्पीड से चले जा रही है  । कालपी से हमीरपुर को जाता यह हाईवे लगभग खाली है  । म्यूजिक प्लेयर गाने बजाए जा रहा है  ;  ''तेरा चेहरा '' खत्म होकर ''तेरा घाटा '' बजने लगा  । मैंने बदलने के लिए हाथ बढ़ाया पर माधव ने रोक दिया। मैंने माधव की तरफ देखा , वह बाहर की तरफ देख रहा था । बाहर अंधेरे में वह न जाने क्या देखने की कोशिश कर रहा है ; कई किलोमीटर दूर किसी गांव की टिमटिमाती लाइट्स दूर से काफी अच्छी लग रही है  । '' थोड़ी देर रोक लूं क्या ? ''-  मैंने पूछा '' नहीं चलने दो '' - उसने वैसे ही बैठे-बैठे कहा । तभी फोन वाइब्रेट हुआ , शायद आस्था फोन कर रही होगी ; ये  पूछने के लिए कि मैं अभी पहुंचा या नहीं ।  अब लगभग 15 - 20 मिनट और लगेंगे । वहां पहुंचकर ही देखूंगा । माधव ने खिड़की का शीशा खोल लिया । हवा की ठंडक महसूस होने लगी तुरंत ही ।  कुछ कहना चाह कर भी मैं चुप रहा ; अब कुछ मिनट में थम जाएगा यह सफर भी ....ना चाहने के बाद भी । ना जाने यह सड़क कितनी दूर तक जाती है । शिवम् सागर समीक्षित । +91955730...

मौजूदगी ।

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मौजूदगी इस बिस्तर पर बैठकर आज कुछ भी लिख पाना मुमकिन नहीं है.... इसकी एक-एक सिलवट मुझे बीते हुए कल में खींचकर ले जा रही है । हालांकि एक झटके में मिटाई जा सकती है इस पर नजर आ रही सारी सिलवटें .....पर मन , मन मारकर कर बैठा है एकदम चुपचाप। तकिया अभी भी दीवार से लग कर ही रखा हुआ है  , किसी भी तरह के बदलाव की जरूरत से एकदम बेखबर । कमरे में मौजूद है एक खुशबू अब तक ; मेरा दिमाग रोक रहा है मुझे सांसे लेने से , इल्जाम लगा रहा है मुझ पर कि मेरी वजह से मिट रही है कमरे से खसखस और गुलाब के मिले-जुले एहसास वाली खुशबू । मेरा बस चलता तो यूनेस्को द्वारा संरक्षित करवा देता यह कमरा.... यह घर... यह गली... सब । पर मेरे बस में नहीं है इतना भी कि एक बोर्ड रख दूं यहां जिस पर लिखा हो - ''प्रवेश वर्जित । कार्य प्रगति पर है । '' कविताओं के अनबूझे अर्थ आज समझ आ रहे हैं... खुल रहे हैं खुद-ब-खुद ; कमरे का टेंपरेचर भी बाहर  से कई गुना कम है ; गिटार बजा रहा है मदमस्त धुनें अपने आप ही । कल शाम को वो यहींं थी इसी कमरे में   शिवम् सागर समीक्षित ♥ 9557301043

वो मेरी सिर्फ दोस्त है ।

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दोपहर में उसका फोन आया , मैं उठा नहीं पाया; कुछ देर बाद उसका मैसेज आया, पर मैंने रिप्लाई नहीं किया । शाम को जब उसे बताया कि मैं माधव के साथ था और उसने सवाल कर दिया कि ''कौन माधव ? '' तब लगा इन दिनों की अपने सब से खास साथी से तो मैंने उसे मिलवाया नहीं  । मैंने बताना शुरू किया- '' माधव मेरा दोस्त इधर 4 - 5 महीनों से जानता हूं उसे , अच्छा नेक दिल लड़का है बस संवेदना के छोड़के चले जाने के बाद से परेशान हो गया है , उसका भरोसा टूट गया है जैसे । अब शायद वह किसी ऐसे को ढूंढ रहा है जो उसके पास आकर , नजदीक बैठकर , उसके साथ अपनी शाम को  बिना शर्त के बिताते हुए कहे कि उसे भरोसा है माधव पर । '' चलिए सुविधा के लिए बता दूं कि मैं जिस से बात कर रहा हूं उसका नाम आस्था है और इसे पिछले 1 साल 7 महीने से जानता हूं  । मैंने आस्था से पूछ दिया कि क्या माधव को हक नहीं है एक बार संवेदना से चिल्लाकर पूछे कि आखिर उसने ऐसा क्यों किया ? '' मैं होती तो मार-मार के पूछती कि क्यों किया  ऐसा ... लेकिन वो माधव है उसकी मर्जी ....  हक की बातें थोड़े समय तक ही  रहती है ।'...

वो चली गई !

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वो चली गई ! एक कवि द्वारा ''जाना हिंदी की सबसे खतरनाक क्रिया'' घोषित कर देने के बावजूद वो चली गई । उसने शायद कभी भी उस कवि को नहीं पढ़ा  , उसने शायद कभी साहित्य ही नहीं पढ़ा ; उसने नहीं पढ़ी थी वो कविताएं भी.. जो बराबर लिखी जाती रही थी उसके लिए , उसी को शब्दों में समेट कर  । उन सभी कविताओं को यहीं मेरे पास छोड़कर कर ......अंततः वो चली गई । मैं सोचता हूं कि अब कविताएं नहीं लिखूंगा कुछेक दिन और इस दौरान इकट्ठा कर लूंगा उसकी तस्वीरें और फिर मैं उसकी मुस्कुराती हुई तस्वीरों का एक कोलाज बनाऊंगा.... बहुत बड़ा सा... जिसके नीचे लिख लूंगा वही लाइन जो एक बार रोमांचित कर देने के बाद हर बार सामान्य सी लगी थी उनको - ''कहो प्रेयसी कैसी हो ? '' हालांकि तस्वीरें उत्तर नहीं देंगी पर तसल्ली तो देगी ही , कम से कम सुन तो सकेंगी ही मेरे गीतों - ग़ज़ल दीवारों की मदद लेकर । उसे ना जाने कब यह भ्रम हुआ कि उसका चले जाना है मेरे जीवन के एक खंड का अंत... इसीलिए खुद को खंडकाव्य  की नायिका मान इसे संपन्न करने की मंशा मन में लिए हुए आखिरकार वो चली गई ।  क्योंकि वह जा चुक...

परिवर्तन ☺

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परिवर्तन निश्चित है । परिवर्तन निरंतर है । परिवर्तन सतत है । एक तरह से परिवर्तन देवता है । सर्वविदित है कि परिवर्तन आता है पर किस दरवाजे से किन चौखटों को लांघ कर..... यह पता नहीं , दरवाजे से आता भी है या कि कूद आता है छज्जों और खिड़कियों से ....ज्ञात नहीं किसी को भी । अतः कह सकते हैं कि परिवर्तन निराकार है । परिवर्तन विश्लेषण है । परिवर्तन निरूपण है ...नवीनता का । परिवर्तन शत्रु है... पुरातनता का । परिवर्तन संहार करता है । परिवर्तन सर्जन के अवसर देता है । इस मायने में परिवर्तन शिव है । परिवर्तन शिव है ... और जहां शिव है शक्ति भी वही है ; क्योंकि परिवर्तन जैसा कल्याणकारी कार्य बिना सबलता के संभव नहीं । अगर कोई पूछे कि ''क्या सारे परिवर्तन सही है ?'' तो मैं कहूंगा कि जब परिवर्तन होने को परिवर्तित नहीं किया जा सकता तो उसे गलत क्यों माना जाए ; हां कुछ परिवर्तन निराशाजनक होते हैं निश्चित रूप से.. परंतु इसमें भी (जहां तक मेरा मानना है) कारण यह है कि मनुष्य का मस्तिष्क स्थायित्व अधिक पसंद करता है । वह सालों साल... असीमित काल तक जो जहां जैसा है उसे वहां वैसा ही ...

एक गुस्ताख़ ग़ज़ल ।

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एक गुस्ताख़ ग़ज़ल । बार - बार जो  करे दिल्लगी, उससे जिगर लगाना  मत । नदी की धार बहायेगी  पर तुम थमना  बह जाना  मत । मन की  मर्ज़ी  चलने  देना  उसको  कभी  दबाना  मत । पर खुद पर भी हो साबित खुद ही उससे दब जाना मत । यही  तो  मेरे  सातो  दिन - बारहो  महीनों  का  साथी मेरे तन्हापन  को  भूले से भी  कुछ कह  जाना  मत । दौड़  रहा  है  संग  मे पर वो  रक़ीब  हमसफ़र  नहीं उससे बचकर रहना , मंज़िल का रस्ता बतलाना मत । शिवम् सागर ।।