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रम्या

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                                    (1) मैं उसकी आंखों के भीतर देखने की कोशिश कर रहा था । मेरी कोशिश थी कि उसकी आंखों में झांक कर उस लड़की को देखूं जिसने 5 बरस पहले इजहार- ए- इश्क किया था मुझसे । रम्या जब एम ए में एडमिशन लेकर कॉलेज में दाखिल हुई थी तब वह काफी अच्छी कविताएं लिखने लगी थी । हिंदी पढ़ने वाली अब तक कितनी लड़कियों से मैं मिला था , रम्या उन सब से अलग थी । उसे हिंदी इसलिए नहीं पढ़नी थी क्योंकि हिंदी पढ़ी जा सकती थी बल्कि उसे हिंदी इसलिए पढ़नी थी क्योंकि वो हिंदी ही पढ़ना चाहती थी । मुझे नहीं पता चला कि हिंदी पढ़ते-पढ़ते वह कब पढ़ने लगी मेरी कविताएं।  मेरे कई गीत उसकी खामोशियों की आवाज बने ऐसा बताया था उसने जब इजहार किया था अपने इश्क का । वह समझती थी मुझको बेहद रोमांटिक बिल्कुल मेरी कविताओं की तरह । उसे नहीं पता था कि ये कविताएं विरोधाभास हैं मेरे जीवन का ; जो सुख सौंदर्य लालसा उत्कंठा पूरी क...

नज़्म ❤🌷🌷

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मुझे  फ़िर  से नया कोई  बहाना  सोचना  होगा .. मेरी अम्मी के हाथों में कुछ एक फोटो नए फिर हैं । उन्हें कैसे  बताऊं ? एक  लड़की है  निराली सी के तस्वीरें हजारों  जिसकी मेरे  फोन  में ही  है । मुझे नफरत है खाला से ;जो हर इतवार की सुब्ह चली आती है घर मेरे ,लिए बच्चों को संग अपने उन्हीं  के पर्स  में  रखी  हुई  होती  है  तस्वीरें ; जो दोपहर तक पहुंचती है मेरी अम्मी के हाथों में। लिये   तस्वीर  हाथों  में बड़ी  बेचैन  होती  हैं अरी शबनम!बता क्या नाम है इसका?कहां की है ? लबों पर खेलती इसके तबस्सुम .. भा गई मुझको अलग रख ले ये फोटो शाम को उसको दिखाऊंगी । अरे तौबा ! ये वाली लाख बेहतर पहले वाली से अदब नज़रों में ही इसकी नज़र आती है न शबनम औ' ये रुखसार की सुर्खी तो जैसे सेब कश्मीरी । हर एक तस्वीर पहले से कुछ  बेहतर ही होती है हर एक तस्वीर के संग मुश्किलें बढ़ती हैं अम्मी की । मैं हैरत में पड़ा  यह सोचने लगता हूं कि अक्सर ये अम्मी ही तो कहती है...

न मिलो तो बेहतर है ।

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''तुम अभी भी कॉलेज आते हो ?'' यकीन मानिए ये #तारीफ_नहीं_थी , ताना था । मैं हॉ करके मुस्कुरा दिया। मुझे मुस्कुराने के लिए होंठो पर काफी ज़ोर देना पड़ा । वो अपनी सहेलियों के साथ मुस्कुराते हुए मुड़ गयी और मैं सोचता रह गया कि आखिर हर बार हर बात इतनी बेतकल्लुफ़ी से कैसे बोल लेती है वो !.......दास्तां के हर हर्फ़ से वाक़िफ़ होने के बावज़ूद । मैंने पलट कर उसकी तरफ  देखा ...वो आगे बढ़ गई थी और मैं पीछे रह गया था  .... काफ़ी पीछे । मैं सोच रहा था कि उसे कुछ और पूछना चाहिए था। मसलन - मेरी जिंदगी में क्या चल रहा है ऐसा कुछ, मेरे एग्जाम्स के बारे में , आगे के प्लांस के बारे में,  उसे पूछना चाहिए था कि मैं कितने बजे तक सो जाता हूं आजकल ...और यह भी कि कविताएं लिखना कम तो नहीं किया ना ?  पर उसने कुछ नहीं पूछा । ठीक वैसे ही जैसे मैंने कुछ नहीं पूछा । कई बार कुछ ना पूछना ही सबसे बड़ा सवाल बन जाता है । और इसी तरह के कई सारे बड़े सवाल मिलकर दुश्वार कर देते हैं हमारी जिंदगी .... हम उलझ जाते हैं सवालों के बनते बिगड़ते जवाबों में  । मेरे पास भी सैकड़ों सवाल थे जिनके जवाब ...

निखिल।

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#समीक्षित '' गिटार के तार बजते भले ही बाहर हों ... पर छेड़ा उन्हें अंदर जाता है .., दिल के अंदर ।''- माधव निखिल को कुछ समझाने की कोशिश कर रहा था । निखिल को घंटा कुछ समझ आ रहा था । आस-पास के दो-चार मुहल्लों में अगर कोई लड़का इन दिनों सच्चे इश्क में था , तो वह निखिल था । इश्क के शहर में अभी हाल ही में दाखिल हुए निखिल को  इश्क हर मर्ज की दवा लगता , हर मुश्किल का हल लगता । इन दिनों हर बात , हर मसले - मुश्किल को सुलझाने की कुब्बत रखने वाला निखिल ''मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती'' वाले पड़ाव पर जी रहा था ''घर वाले नहीं मानेंगे'' वाली सच्चाई से बिल्कुल बेखबर  । वो बड़े खूबसूरत सपने सजाता और उन्हे अपने दोस्तों के साथ में साझा करता । माधव को इश्क में नाकाम होते देख सोचता कि उसके और कामिनी के बीच आने वाली मुश्किलों को वह कितने अच्छे से हैंडल कर लेता है । वो माधव को भी एक सांस में कई सजेशन दे डालता है , माधव सुनता है उसे .... बड़ी खामोशी के साथ ।  आखिर बस मुस्कुरा देता है । करने को माधव आगाह कर सकता है निखिल को पर निखिल ने अभी-अभ...

रास्ते ।

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कार अपनी स्पीड से चले जा रही है  । कालपी से हमीरपुर को जाता यह हाईवे लगभग खाली है  । म्यूजिक प्लेयर गाने बजाए जा रहा है  ;  ''तेरा चेहरा '' खत्म होकर ''तेरा घाटा '' बजने लगा  । मैंने बदलने के लिए हाथ बढ़ाया पर माधव ने रोक दिया। मैंने माधव की तरफ देखा , वह बाहर की तरफ देख रहा था । बाहर अंधेरे में वह न जाने क्या देखने की कोशिश कर रहा है ; कई किलोमीटर दूर किसी गांव की टिमटिमाती लाइट्स दूर से काफी अच्छी लग रही है  । '' थोड़ी देर रोक लूं क्या ? ''-  मैंने पूछा '' नहीं चलने दो '' - उसने वैसे ही बैठे-बैठे कहा । तभी फोन वाइब्रेट हुआ , शायद आस्था फोन कर रही होगी ; ये  पूछने के लिए कि मैं अभी पहुंचा या नहीं ।  अब लगभग 15 - 20 मिनट और लगेंगे । वहां पहुंचकर ही देखूंगा । माधव ने खिड़की का शीशा खोल लिया । हवा की ठंडक महसूस होने लगी तुरंत ही ।  कुछ कहना चाह कर भी मैं चुप रहा ; अब कुछ मिनट में थम जाएगा यह सफर भी ....ना चाहने के बाद भी । ना जाने यह सड़क कितनी दूर तक जाती है । शिवम् सागर समीक्षित । +91955730...

मौजूदगी ।

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मौजूदगी इस बिस्तर पर बैठकर आज कुछ भी लिख पाना मुमकिन नहीं है.... इसकी एक-एक सिलवट मुझे बीते हुए कल में खींचकर ले जा रही है । हालांकि एक झटके में मिटाई जा सकती है इस पर नजर आ रही सारी सिलवटें .....पर मन , मन मारकर कर बैठा है एकदम चुपचाप। तकिया अभी भी दीवार से लग कर ही रखा हुआ है  , किसी भी तरह के बदलाव की जरूरत से एकदम बेखबर । कमरे में मौजूद है एक खुशबू अब तक ; मेरा दिमाग रोक रहा है मुझे सांसे लेने से , इल्जाम लगा रहा है मुझ पर कि मेरी वजह से मिट रही है कमरे से खसखस और गुलाब के मिले-जुले एहसास वाली खुशबू । मेरा बस चलता तो यूनेस्को द्वारा संरक्षित करवा देता यह कमरा.... यह घर... यह गली... सब । पर मेरे बस में नहीं है इतना भी कि एक बोर्ड रख दूं यहां जिस पर लिखा हो - ''प्रवेश वर्जित । कार्य प्रगति पर है । '' कविताओं के अनबूझे अर्थ आज समझ आ रहे हैं... खुल रहे हैं खुद-ब-खुद ; कमरे का टेंपरेचर भी बाहर  से कई गुना कम है ; गिटार बजा रहा है मदमस्त धुनें अपने आप ही । कल शाम को वो यहींं थी इसी कमरे में   शिवम् सागर समीक्षित ♥ 9557301043

वो मेरी सिर्फ दोस्त है ।

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दोपहर में उसका फोन आया , मैं उठा नहीं पाया; कुछ देर बाद उसका मैसेज आया, पर मैंने रिप्लाई नहीं किया । शाम को जब उसे बताया कि मैं माधव के साथ था और उसने सवाल कर दिया कि ''कौन माधव ? '' तब लगा इन दिनों की अपने सब से खास साथी से तो मैंने उसे मिलवाया नहीं  । मैंने बताना शुरू किया- '' माधव मेरा दोस्त इधर 4 - 5 महीनों से जानता हूं उसे , अच्छा नेक दिल लड़का है बस संवेदना के छोड़के चले जाने के बाद से परेशान हो गया है , उसका भरोसा टूट गया है जैसे । अब शायद वह किसी ऐसे को ढूंढ रहा है जो उसके पास आकर , नजदीक बैठकर , उसके साथ अपनी शाम को  बिना शर्त के बिताते हुए कहे कि उसे भरोसा है माधव पर । '' चलिए सुविधा के लिए बता दूं कि मैं जिस से बात कर रहा हूं उसका नाम आस्था है और इसे पिछले 1 साल 7 महीने से जानता हूं  । मैंने आस्था से पूछ दिया कि क्या माधव को हक नहीं है एक बार संवेदना से चिल्लाकर पूछे कि आखिर उसने ऐसा क्यों किया ? '' मैं होती तो मार-मार के पूछती कि क्यों किया  ऐसा ... लेकिन वो माधव है उसकी मर्जी ....  हक की बातें थोड़े समय तक ही  रहती है ।'...