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आठवी जी के लड़के

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ये बच्चे जिन जगहों से आते हैं वहाँ बहुतों की ज़िंदगी 10 ×10 के कमरे में बीत जाती है, वहाँ लोगों को नहीं पता कि सिविक सेंस किस चिड़िया का नाम है, सरकारें जिन जगहों को अपने वोटबैंक के तौर पर यूज़ करती है और फिर भूल जाती हैं। इन जगहों से निकलने वाले इन बच्चों से रफ़्तार- गुफ़्तार- नशिश्त- बरख़ास्त की उम्मीद लगाना बेमानी है, अदबी रवैये की तवक़्क़ो बेकार है। इनमें से एक घर पहुंच कर सीधा दादा की दुकान पर जाएगा, और दूसरा ब्रा सिलने के लिए मशीन पर बैठ जाएगा। तीसरा जेल में बंद अपने वालिद से मिलाई पर जाएगा और चौथा घर का सिलेंडर भरवाने। पाँचवा सिले हुए कुर्ते सिर पर उठा दुकान मे देने जाएगा और छठवा साइकिल पे कुछ सामान लटका कर फेरी लगाएगा। नैतिकता-सभ्यता-सामाजिकता जैसे शब्दों को बारहाँ कुचलते हुए ये अपने और अपने परिवार के लिए कमाते ये लड़के पूरे मुस्तफ़ाबाद में घूमते है और इस पूरे इलाके को अपनी जागीर समझते हैं। इन लड़को को भूगोल दिल्ली का भी नहीं पता पर भौकाल इतना जैसे कि कनाडा को जेब में लेकर घूम रहे हो। अव्यवस्थित व्यवस्थाओं की मार के सताए हुए क्षेत्र के ये असंतुलित बच्चे किसी का सर ...

14 अगस्त

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एक देश जिसको लेकर एक दूसरे देश में इतने पूर्वग्रह, इतनी कम समझ है कि आप उसके बारे में बात करने भर से, उसको सुंदर कह देने भर देशद्रोही बन सकते हैं।  एक देश जो एक दूसरे देश से कुछ देर पहले आज़ाद हुआ पर उसके आक़ाओं ने उसे कई-कई बार ऐसे चलाया/खपाया जैसे वो उनके घर की जागीर हो।  एक देश जिसको लेकर एक दूसरे देश का एक वर्ग ये मान कर चलता है कि वहाँ सब बगल वाले देश को, उसके नागरिकों को बद्दुआएं ही दे रहे होंगे; ये मानता है कि वहाँ के लोग बेकार हैं। अजीब ये है कि वही वर्ग ये भी चाहता है कि ये देश उस देश पर आक्रमण कर कब्जा कर ले। मैं सोचता हूँ तब उस देश की जनता को कैसे स्वीकार करेंगे दूसरे देश वाले?  एक देश जिसमें खूबसूरत मौसिक़ी है, एक देश जिसमे खूबसूरत बाग़ीचे हैं, एक देश जिसमे खूबसूरत ईमारतें हैं, एक देश जिसमें अदबी लोग हैं।  एक देश जो एक दूसरे देश का खूबसूरत हमसफर हो सकता था पर दोनों ही देशों के सियासती चोंचलों ने दोनों को एक-दूसरे का दुश्मन बना दिया।  एक देश जिसके शहर एक दूसरे देश के शहरों के जुड़वा लगते हैं।  एक देश जहाँ बोली जाने वाली ज़बान लगभग एक दूसरे देश के...

एक दिन शाम को ट्रक आकर खड़ा हुआ और अम्मी अब्बू उसमें सामान भरने लगे

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........................................................................ कासिफ नाम के इस लड़के को क्लास के सारे बच्चे पंजाबी बुलाते हैं । मैंने कारण पूछा तो पता चला कि ये बच्चा कुछ दिन पहले ही पंजाब से दिल्ली आया है। मैंने पास बुलाया, बिठाया और बात की। बहुत आहिस्ता-आहिस्ता बोलते हुए उसने सब बताया: " पहले ये सब नाम से ही बुलाते थे... एक दिन इन लोगों की पूछा कि मैं कहाँ से आया हूँ तो मैंने बता दिया। इन सबने कहा कि पंजाबी बोल कर दिखाओ। मैंने बोल दी। तब से ये लोग मुझे पंजाबी-पंजाबी ही कहते हैं" Me: " तुमको बुरा लगता होगा" He: " नहीं लगता सर!" Me: "अच्छा पंजाब में कहाँ रहते थे...?" He: "वहाँ पर गली नम्बर नहीं था सर..." Me:"....मेरा मतलब शहर ?" He: " वो नहीं पता सर...पर वहाँ पर बड़ा सा घर था" Me: "अच्छा यहाँ पर कहाँ रहते हो?" He: "16 नम्बर गली में" Me: " यहाँ नये दोस्त बने?" He: " अभी तो नहीं पर वहाँ मेरे बहुत दोस्त थे। अरमान , जीशान, अल्तमस, शिवा,गुरमीत सबके साथ मैं खूब खेलता था। वहाँ तो...

तारीकी

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चौदस की ये रात अँधेरी  हौले से  अपनी स्याही में उसके मन को डुबा रही है उसका जीवन डुबा रही है आसमान से गुम है चंदा।    वो बेसुध-बेहोश ज़रा-सा नींद में है और होश ज़रा-सा बालकनी पे लटके  दुनिया देख रहा है।  बेसुध इतना है कि नीचे गिर सकता है इक मामूली धक्के से वो मर सकता है होश में इतना है कि ये सब सोच-समझ लेन के बाद भी वहीं खड़ा है. . . जबकि इस सुनसान रात में ये अपनी माशूकाओं को ख़त लिख सकता है, बना के दो कप कॉफी  अपने हैंगओवर से लड़ सकता है, पन्ने अपनी डायरियों के  नीले रंग से भर सकता है, बढ़ी हुई दाढ़ी ट्रिम कर के थोड़ा-बहुत संवर सकता है, अपने जीवन की तारीकी दोनों हाथ लुटा सकता है, भूले-बिसरे यारों को  खुद अपनी तरफ से फोन मिलाकर  सब शुबहात मिटा सकता है... काश... काश वो थोड़ा और होश में आ जाए काश वो इन सारे कामों को निपटाए या फिर उस पर  और बेहोशी तारी हो भूल जाए सब, इस हद तक सिर भारी हो   भूल जाए ये बात कि वो अगले पल कुछ भी कर सकता है वो सोना ही चुन ले जबकि वो अगले पल मर सकता है सोने से ये रात मेहरबाँ हो जाएगी  सोने से सब प...

आज़ादी!!!

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#समीक्षित ❤️ पच्चीस बरसों में पहली बार पन्द्रह अगस्त वाले दिन सफर किया. . . घर से कानपुर आया। रास्ते में बीसियों रैलियाँ मिली, तिरंगा लहराते सैकड़ों लोग दिखे। छतों पर हवा से बतकही में लगे हजारों ध्वजों को देखकर मन बारम्बार रोमांचित होता रहा।  घर से निकलने की जल्दी में पानी की बोतल रखना भूल गया। रास्ते में पानी साथ न होना कई बार परेशानी का सबब बन जाता है क्योंकि प्यास लगने पर मन पैक्ड वॉटर लेने और नहीं लेने के द्वंद्व में पड़ जाता है। बीस रुपये की बोतल लेना कई बार  फिजूल लगता है। अब अक्सर मैं पानी के बजाय छाछ, लस्सी या दूध ले लेता हूँ। पहले कोल्ड ड्रिंक ले लिया करता था पर इधर कुछ दिनों से उसको भी कम किया है। कानपुर तक आते-आते रास्ते में कई जगह बारिश मिली। रुई के फाहों से बादल हवा के साथ-साथ गिरते-पड़ते-उड़ते भागे जा रहे थे जैसे बूँदी बंटने के बाद प्राइमरी स्कूलों के बच्चे भागते हैं। ये छुट्टी होते ही घर की ओर भागने का सुख भी केवल प्राइमरी और उसके जैसे सीमित पहुंच वाले स्कूल के बच्चों को ही नसीब है वरना बढ़ते कॉन्वेंटीकरण में बच्चे या तो स्कूल बस में सवार हो जाते है या फिर खड़े ...

आपको पतंग उड़ाना आता है?

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आसमान में उड़ती पतंगें मेरे लिए किसी आश्चर्य से कम नहीें! और उनको उड़ाने में लगे सधे हुए हाथ किसी जादूगर के जैसे लगते है हमेशा।  तीन बरस पहले की बात है एक शाम जब मैं पनकी नहर के किनारे बैठा था , एक सात-आठ बरस के बच्चे ने मेरे पास आकर कहा कि मैं उसे पतंग उड़ाना सिखाऊँ। मैं पल भर को उस बच्चे की आँखों में झाँककर ये समझने की कोशिश करने लगा कि आख़िर उसे मेरे भीतर कौन सा पतंगबाज़ दिखाई दे गया।  मैंने उसकी गर्दन को नीचे करते हुए धीरे से उसके कान में कहा- मुझे पतंग उड़ाना नहीं आता। वो लगभग चौंक गया। संभवतः उसने अपने से बड़े लगभग सभी लोगों को पतंग उड़ाते देखा होगा। उसने कहा कि जब वो अपने गाँव जाएगा तब चाचा से पतंग उड़ाना सीखेगा। उसने ये भी कहा था कि वापस आकर मुझे भी पतंग उड़ाना सिखाएगा पर . . .  ये न थी हमारी क़िस्मत ! मुझे पतंगे उड़ाना नहीं आता। पतंग ही क्या , मुझे कंचे खेलना , गुल्ली-डंडा खेलना , लट्टू नचाना (आदि) नहीं आता। इस तरह के खेलों के लिए हमे घर से छूट नहीं मिली थी । कथित रूप से ये खेल आवारा बच्चों के खेल थे जिनका पढ़ने-लिखने से वास्ता नहीं था। पढ़-लिख तो मैं क्या ही पाय...

संवेदना का जन्मदिन 🌺

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 #समीक्षित   एक चेहरा जिसका ख़्याल आने भर से बैकग्राउंड मे सैंकड़ों  वॉयलिन बज उठती हैं  एक चेहरा जिसके तसव्वुर भर से हक़ीक़त के एहसास को समझा जा सकता है , शरीअत - मारिफ़त को लाँघकर . . . एक चेहरा जिसको याद करना तब-तब ज़रूरी हो उठता है जब-जब राहत फ़तेह गाते है कि -  "    चेहरा एक फूल की तरह शादाब है       चेहरा उसका है या कोई महताब है  " एक चेहरा जो ख़ुद को सियाह लिबास से ढँक अपने रंगों को छिपाने की नाकाम कोशिशें करता रहता है  एक चेहरा जो एक मिनट मे बहत्तर बार सीने से हो कर गुज़रता है  आज उसी नूरानी चेहरे की यौम-ए-पैदाइश है , आज उसी चेहरे का जन्मदिन है . . . पर . . . . . . पर माधव में इस बार इतनी हिम्मत नहीं कि एक फ़ोन कर उसे बधाई दे सके , एक स्टोरी , एक अदद स्टेटस अपडेट कर सके ! माधव को याद है कि पिछले बरस इसी तारीख़ को उसके मैसेज तक नही देखे गए थे और जब देखे गये तब उनको काबिल-ए-जवाब नहीं पाया गया। उस दिन को माधव ने अपनी डायरी में उसके और संवेदना के रिश्ते के आख़िरी दिन के रूप में दर्ज किया था। आज सुबह से ...