#समीक्षित एक चेहरा जिसका ख़्याल आने भर से बैकग्राउंड मे सैंकड़ों वॉयलिन बज उठती हैं एक चेहरा जिसके तसव्वुर भर से हक़ीक़त के एहसास को समझा जा सकता है , शरीअत - मारिफ़त को लाँघकर . . . एक चेहरा जिसको याद करना तब-तब ज़रूरी हो उठता है जब-जब राहत फ़तेह गाते है कि - " चेहरा एक फूल की तरह शादाब है चेहरा उसका है या कोई महताब है " एक चेहरा जो ख़ुद को सियाह लिबास से ढँक अपने रंगों को छिपाने की नाकाम कोशिशें करता रहता है एक चेहरा जो एक मिनट मे बहत्तर बार सीने से हो कर गुज़रता है आज उसी नूरानी चेहरे की यौम-ए-पैदाइश है , आज उसी चेहरे का जन्मदिन है . . . पर . . . . . . पर माधव में इस बार इतनी हिम्मत नहीं कि एक फ़ोन कर उसे बधाई दे सके , एक स्टोरी , एक अदद स्टेटस अपडेट कर सके ! माधव को याद है कि पिछले बरस इसी तारीख़ को उसके मैसेज तक नही देखे गए थे और जब देखे गये तब उनको काबिल-ए-जवाब नहीं पाया गया। उस दिन को माधव ने अपनी डायरी में उसके और संवेदना के रिश्ते के आख़िरी दिन के रूप में दर्ज किया था। आज सुबह से ...
ए मेरे दोस्त ! उस दिन जब_ बरसों के बाद मिले हम तो हमारे पास बेहद कम मुद्दे थे__बात करने लायक इसीलिए बात और भी कम हुई खामोशी थी सिर्फ तादाद में बहुत ज्यादा । इधर कई बरस बीत जाने के ...
मज़दूर आ रहे हैं । वे आ रहे हैं क्योंकि शासन प्रशासन उन तक नहीं जा पाया । वे आ रहे हैं क्योंकि वो शहर उनको रोकने की शक्ति नहीं जुटा पाए जिनको बसाने में उनके कंधों ने बोझ उठाया था , जिस को बसाए रखने में उनके जिस्म दोहरा गए थे । बच्चों को छोड़कर घर-घर काम करने वाली हज़ारों-हज़ार महिलाएं आज अपने बच्चों को लिए सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय कर रही है । जिन घरों में सुबह-शाम की जीवन शैली उन पर निर्भर हुआ करते थी, उनमें से कोई भी घर इनको रोक पाने में सक्षम नहीं हो पाया । मेरा एक दोस्त दिल्ली के आकर्षण से खिंच कर वहां गया था, कई साल वहां रहने के बाद घटनाक्रम कुछ यूं बना कि वापस उसे यही लौटना पड़ा । आज वह सामान्य बातचीत में भी कह देता है कि ''दिल्ली किसी की नहीं हो सकती''। असल में शहरीकरण ने आंखों में चकाचौंध तो खूब भरी पर गरीब का पेट भरने में वो काफ़ी सफल नहीं हो सका । संविधान से जीवन और आजीविका की गारंटी मिलने भर से जीवन और आजीविका का मिलना और उसका बना रहना सुनिश्चित नहीं होता । मोबाइल जर्नलिज्म के इस दौर में उन मज़दूरों की पीड़ा , उनके दर्द को बयां करते ना जाने कि...
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